Kauwa Aur Mor | Borrowed Feathers Could Not Hide His Voice
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मोरपंख बाँधकर कौवा मोरों के बीच पहुँच गया है, पर परिचय पूछे जाने पर अपनी आवाज़ कैसे छिपाएगा?
कौवा राज-उपवन के मोरों को देखकर उनकी सुंदरता और सुविधा से ईर्ष्या करता है। गिरे हुए मोरपंख अपने शरीर पर बाँधकर वह उनके बीच पहुँच जाता है। कुछ समय तक चुप रहकर अपना रूप छिपाता है, लेकिन परिचय पूछे जाने पर उसकी आवाज़ सच खोल देती है।
कौवा और मोर की इस हिंदी कहानी में बनावटी पहचान और भरोसे का रिश्ता देखिए। दूसरों की खूबी की प्रशंसा करना अलग बात है, और स्वीकार किए जाने के लिए अपनी पहचान छिपाना अलग। कौवे की गलती उसे आत्मसम्मान की सीख देती है।
Chapters
0:00 The Voice Gives Him Away
0:12 A Garden Full of Color
0:59 Borrowing a New Look
3:50 One Question Too Many
4:35 The Crow Chooses Honesty
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Hindi transcript
The narration as spoken, from the caption track uploaded with this video.
- 0:04.088 एक साधारण कौवा मोरों जैसा सुख पाने को राज-उपवन में घुसा, पर उसकी अपनी आवाज ने ही उसका भेद खोल दिया।
- 0:12.088 एक उजली सुबह वह खुले आकाश में अपने चौड़े काले पंख फैलाकर बहुत दूर तक उड़ता जा रहा था।
- 0:20.088 उड़ते-उड़ते उसकी नज़र नीचे राजा के विशाल उपवन पर पड़ी, जहाँ हर ओर हरियाली चमक रही थी।
- 0:27.004 पेड़ों और फूलों के बीच अनेक रंग-बिरंगे पक्षी मधुर स्वर में चहचहाते हुए आनंद से घूम रहे थे।
- 0:35.004 उन सबमें मोर सबसे अधिक थे; उनके नीले-हरे पंख धूप में दमकते देखकर मुग्ध कौवा पास की डाल पर आ बैठा।
- 0:43.004 डाल से उसने देखा, उपवन में पक्षियों के लिए साफ पानी और स्वादिष्ट दाने हर जगह भरकर रखे गए थे।
- 0:51.004 मोर निश्चिंत होकर दाने चुगते, छाया में विश्राम करते और राजा के सुरक्षित उपवन में आनंद मनाते थे।
- 0:59.004 ये मोर कितने भाग्यशाली हैं! इन्हें बिना भटके अच्छा भोजन, सुंदर घर और सबका सम्मान मिलता है।
- 1:07.004 अपने साधारण काले पंख देखकर कौवे के मन में पहली बार गहरी कमी और ईर्ष्या का भाव जागा।
- 1:15.004 यदि मैं भी मोर जैसा दिखाई दूँ, तो शायद इस उपवन में सुख से रहूँगा और भरपेट दाने खा सकूँगा।
- 1:21.545 अब कौवा किसी भी उपाय से उस उपवन में प्रवेश पाना चाहता था, पर अपना भेद छिपाना कठिन था।
- 1:29.545 वह देर तक सोचता रहा, तभी उसे जंगल की पगडंडी पर बिखरे मोरों के गिरे हुए पंख याद आए।
- 1:35.883 कौवा तुरंत घने जंगल पहुँचा और झाड़ियों, घास तथा सूखे पत्तों के बीच चमकीले पंख खोजने लगा।
- 1:43.883 कुछ ही देर में उसे कई लंबे, सुंदर मोरपंख मिले, जो मोरों से झड़कर सूखी घास पर गिरे थे।
- 1:51.883 वह उन गिरे पंखों को सावधानी से चोंच में दबाकर एक बड़े सुनसान पेड़ के नीचे ले आया।
- 1:58.466 कौवे ने तिनकों और लताओं की सहायता से वे रंगीन पंख अपने काले पंखों के ऊपर सजा लिए।
- 2:04.466 एक-एक चमकीला पंख जुड़ने पर उसका रूप बदलता गया, पर भीतर वह वही परिचित काला कौवा बना रहा।
- 2:12.466 अब वहाँ कोई मुझे पहचान नहीं पाएगा; ये मोर मुझे अपना साथी समझेंगे और उपवन में रहने देंगे।
- 2:19.424 नकली मोरपंख फैलाकर वह अकड़ता हुआ राजा के उपवन की ओर चला और खुले द्वार से भीतर पहुँचा।
- 2:27.424 मोरों ने दूर से रंगीन पंख देखे, इसलिए किसी ने उस अनजान पक्षी को तुरंत बाहर नहीं रोका।
- 2:34.34 पहले दिन कौवा मोरों के बीच चुपचाप घूमता रहा और सबसे दूरी रखकर अपना भेद खुलने से बचाता रहा।
- 2:42.34 जब खाने का समय आया, उसने भी भरपेट अच्छे दाने खाए, जैसा सुख पाने की उसने कल्पना की थी।
- 2:50.34 मनचाहा भोजन मिलने पर वह प्रसन्न था, फिर भी आवाज निकल जाने का डर उसे भीतर से सताता रहा।
- 2:58.34 एक विनम्र मोर धीरे उसके पास आया, स्वागत में सिर झुकाया और मित्रता से परिचय पूछना चाहा।
- 3:05.256 नए मित्र, आपका स्वागत है। आप किस वन से आए हैं, और यहाँ अब तक इतने शांत क्यों हैं?
- 3:11.256 कौवे ने केवल सिर हिलाया और चोंच बंद रखी, क्योंकि एक काँव उसकी सारी बनावट खोल सकती थी।
- 3:19.256 पूरा पहला दिन बीत गया, फिर दूसरा दिन भी ढलने लगा, पर नकली मोर ने किसी से बात नहीं की।
- 3:27.256 उसकी लगातार चुप्पी से दूसरे मोरों को आश्चर्य हुआ, और वे उसके चारों ओर जिज्ञासा से जमा हो गए।
- 3:35.256 एक बुज़ुर्ग मोर ने उसके पंख ध्यान से देखे; रंग सुंदर थे, मगर चाल और चोंच कुछ अलग लगी।
- 3:43.256 मित्र, हम सब आपसे मिलना चाहते हैं। कृपया अपनी आवाज में केवल एक छोटा-सा स्पष्ट उत्तर दीजिए।
- 3:49.797 इतने मोरों की आँखें अपने ऊपर देखकर कौवा घबरा गया; उसने बचने को चोंच खोली, पर पुरानी आदत जीत गई।
- 3:57.797 काँव! काँव! मुझे जाने दो। मैं अभी किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता, बस मुझे शांत रहने दो।
- 4:04.588 कौवे की कर्कश काँव सुनते ही उपवन का मधुर कलरव थम गया और सभी मोर उसका चेहरा देखने लगे।
- 4:11.213 पास से मोरों ने काले पंखों के ऊपर लगाए गए ढीले रंगीन पंख और बँधे तिनके पहचान लिए।
- 4:19.213 तुम मोर नहीं, कौवा हो! हमारे गिरे पंख लगाकर तुमने यहाँ रहने और अच्छा भोजन पाने के लिए छल किया है।
- 4:27.213 नाराज़ मोरों ने उसे घेर लिया और उसके ऊपर लगे नकली पंख एक-एक करके खींचकर अलग कर दिए।
- 4:35.213 नकली पंख हटते ही उसका असली काला रूप सबके सामने आ गया; अब किसी भ्रम की गुंजाइश नहीं रही।
- 4:43.213 सभी मोरों ने धोखा देने वाले कौवे को अपने झुंड से दूर किया और राजा के उपवन के बाहर खदेड़ दिया।
- 4:51.213 दूसरों जैसा बनकर सम्मान नहीं मिलता। मैंने अपने असली रूप को ठुकराया, इसलिए विश्वास भी खो दिया।
- 4:59.213 सीख यही है कि बनावटी दिखावा जल्दी खुल जाता है; सच्चा सम्मान अपनी पहचान और ईमानदारी में मिलता है।